संदेश

2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“भारत में न्याय: ताक़त बनाम सच”

चित्र
क्या आज भी भारत में न्याय सबके लिए समान है? आइए, एक सच्ची-सी लगने वाली कहानी के ज़रिए सोचते हैं। एक पढ़ा-लिखा, शादीशुदा युवक था। वह किसी बड़े शहर में नौकरी कर सकता था, लेकिन बीमार पिता और परिवार की ज़िम्मेदारी ने उसे गाँव के बाहर सड़क किनारे परचून की दुकान खोलने पर मजबूर कर दिया। चार साल से वह ईमानदारी से अपनी छोटी-सी दुकान चला रहा था। एक  दिन दोपहर में, दुकान बंद कर वह घर जा रहा था। तभी याद आया—घर का सामान लेना है। उसने बाइक दुकान के बाहर साइड में खड़ी की ही थी कि अचानक तेज़ आवाज़ आई। गाँव के प्रधान के ट्रैक्टर ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी। ड्राइवर नशे में था। विरोध करने पर उसने माफी माँगी, और बाइक ठीक कराने का वादा किया और अपना नंबर देकर चला गया—क्योंकि उसकी ट्रॉली में किसी मृत व्यक्ति की अर्थी रखी थी। दुकानदार ने इंसानियत दिखाते हुए उसे जाने दिया। लेकिन अगला दिन सच्चाई लेकर आया। फोन करने पर वही ड्राइवर धमकाने लगा, फिर उसने फोन उठाना बंद कर दिया। शिकायत प्रधान तक पहुँची—और प्रधान ने साफ़ हाथ खड़े कर दिए। “ट्रैक्टर मेरा है, ड्राइवर नहीं।” क्योंकि ड्राइवर वर्तमान के ग्र...