“भारत में न्याय: ताक़त बनाम सच”
क्या आज भी भारत में न्याय सबके लिए समान है?
आइए, एक सच्ची-सी लगने वाली कहानी के ज़रिए सोचते हैं।
एक पढ़ा-लिखा, शादीशुदा युवक था। वह किसी बड़े शहर में नौकरी कर सकता था, लेकिन बीमार पिता और परिवार की ज़िम्मेदारी ने उसे गाँव के बाहर सड़क किनारे परचून की दुकान खोलने पर मजबूर कर दिया। चार साल से वह ईमानदारी से अपनी छोटी-सी दुकान चला रहा था।
एक दिन दोपहर में, दुकान बंद कर वह घर जा रहा था। तभी याद आया—घर का सामान लेना है। उसने बाइक दुकान के बाहर साइड में खड़ी की ही थी कि अचानक तेज़ आवाज़ आई।
गाँव के प्रधान के ट्रैक्टर ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी।
ड्राइवर नशे में था। विरोध करने पर उसने माफी माँगी, और बाइक ठीक कराने का वादा किया और अपना नंबर देकर चला गया—क्योंकि उसकी ट्रॉली में किसी मृत व्यक्ति की अर्थी रखी थी। दुकानदार ने इंसानियत दिखाते हुए उसे जाने दिया।
लेकिन अगला दिन सच्चाई लेकर आया। फोन करने पर वही ड्राइवर धमकाने लगा, फिर उसने फोन उठाना बंद कर दिया।
शिकायत प्रधान तक पहुँची—और प्रधान ने साफ़ हाथ खड़े कर दिए।
“ट्रैक्टर मेरा है, ड्राइवर नहीं।” क्योंकि ड्राइवर वर्तमान के ग्राम प्रधान का था और ट्रैक्टर गाँव के पूर्व प्रधान का था और दोनों आपस में कुटुंबि भाई या ये कहें कि रिश्तेदार थे।
गाँव वालों की सलाह और भी डराने वाली थी—
“वो बड़े लोग हैं, ज़मीन-जायदाद वाले… पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी।”
क्योंकि पुलिस अधिकारियों और बड़े नेताओं के साथ भी उनका उठना बैठना अच्छा खा सा है।
पुलिस वाले कुछ नहीं करेंगे बस पैसे खा कर तुम्हारा केस रफा दफा कर देंगे। क्योंकि तुम्हारा केस उनके लिए कोई नया नहीं है।
तब दुकानदार के मन में सवाल उठा—
क्या यही न्याय व्यवस्था है?
अगर उसकी जगह कोई मज़दूर या सब्ज़ी वाला होता, तो वह कहाँ जाता?
शायद इसी असमान सिस्टम की वजह से आज भी देश में आक्रोश है, दंगे हैं, अराजकता है।
अब आप बताइए—
👉 इस कहानी से आपने क्या जाना?
👉 क्या सच में सिस्टम सबके लिए बराबर है?
अपनी राय ज़रूर दीजिये…
फिर मिलेंगे एक नई कहानी के साथ।
नमस्कार साथियो।
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